Monday, October 3, 2011

फिर से जिंदगी

सुना क्या तुमने?    
मेरी ख्यालों में बसी हुई शिकायत की आहट को
देखा क्या तुमने ?
मेरी आँखों में बुझे अँधेरे को
छुआ क्या तुमने?
मेरी ख़ामोशी में समाये हुए शोर की ठंडक को 
पाया क्या तुमने?
उसको जो हमने कहीं खो दिया है
महसूस किया तुमने?
उस स्पर्श को जो कितना अपना सा है 
मिला क्या तुमको?
वो सन्देश जो अब भी कहीं मन की गहराइयों में दफ़न है |

लौट आई है क्या?
तुम्हारे होठों पे फिर से वही मुस्कान
तुम्हारी बातों में फिर से वही मासूमियत
तुम्हारी आँखों में फिर वही शरारत
तुम्हारे गालों की लाली |

क्या जी उठा है फिर वही डर?
फिर वही दर्द 
वही तड़प
और बेचैनी?

क्या जिंदगी से हो गयी है तुम्हारी सुलह?
फिर से ख़ामोशी से चहकना
कुछ न कहकर
सब कह जाना
क्या फिर से ?

हाँ मैंने सुना
जो तुमने नहीं कहा 
क्यूंकि
मैंने भी फिर से
सीख लिया है उड़ना 
वो धुन्दले ख्वाब बुनना
वो नगमे फिर से सुनना |

Saturday, April 23, 2011

पुनर्जन्म






चिलचिलाती धुप में प्यासा सा मैं
थक कर हाँफ रहा था कि
तेज हवा के साथ बारिश कि ठंडी बूँद 
गिरी जो माथे पर
चौंक गया, कुछ याद आया
पलकें जो भीगी, तो नजर आया

कि कंपकपाती सी
जो सामने खड़ी थी, मुस्कुराती सी
चमक लिए आँखों में 
खोले वो बाहें, उमंगों में लिपटी 
भीगी सी पलकें और वो साड़ी का
पल्लू कुछ अलग सा था
खुले से होठों पे शायद कुछ
शिकायत लिए तुम 
बढ़ रही थी 
कदम दर कदम 
नजदीक लग रही थी ||

और ये बारिश 
एक नुकीले तीर के  जैसी
मेरी आत्मा को भेद रही थी 
मन कि उलझन और सीने के डर ने
यूँ जकड़े थे कदम
और यूँ डगमगाता सा सोच रहा था मैं
कि अब और कितना नीचे गिरुं||

कि अचानक से तुमने जो आगोश में ले लिया
छूट गए सब बंधन
टूट गए सारे सपने
पिघल गया घनी बारिश में तन मेरा
एक लाल सागर में समां रहा है
और मेरी रूह कि खुशबू अब हवा में है||

हाँ, मैं मुक्त हो रहा हूँ
थम गयी है बारिश
तुम्हारा भी कोई निशाँ नहीं है
धुप कि वो चमक कहाँ है
पानी भी है पर प्यास नहीं है
और आँखों में भी 
एक नया खालीपन है
हवा के जैसा हल्का हो गया हूँ
शायद,
यही पुनर्जन्म है ||


Saturday, October 2, 2010

खादी का बस्ता

ये सोच के चलता हूँ कि चलते रहना है,
कठपुतलियों कि अठखेलियों में,
ठहाकों का मजा लेना है |

घिर कर खिलौनों से, बचपने में खो जाना है,
बस रात-दिन के फेर में,सोच-समझ से परे,
स्वचलित एक दिन हो जाना है |

ये कौन सा पड़ाव है
जो ना कभी गुरु जी ने पढाया था,
किस और चल पड़ा हूँ मैं
दादा जी ने कभी ये रास्ता तो ना दिखाया था |

क्या मैं उलझा हूँ इस मन कि उलझन में?
या फिर मेरी बेखयाली कि दुनिया का
ये भी एक बहिष्कृत ख़याल है?

या है ये वैसा ही सवाल,
जिसके जैसे बहुत सारे,
ठूंस कर भरे हैं
मेरे सिरहाने रखे,
 खादी के बसते में|

हर संध्या इन सवालों के, जवाब लिखा करता हूँ,
हर रात इन पहेलियों में उलझा,
ख़्वाबों में सुलझाया करता हूँ|

हर भोर सवालों का बस्ता, सिरहाने छोड़ जाता हूँ,
कूद जाता हूँ दुनिया के सागर में,
चंद नए सवाल समेट लाता हूँ|

और मेरे सिरहाने का बस्ता, बस यूँ भरता ही जाता है,
हर रात जो लगती है चौपाल,
एक नया सवाल गर्माता है|

घट जाता है निद्रा का पहरा,
अंतर्द्वंद बढ़ता ही जाता है||