Sunday, May 19, 2024

Pre dawn blues

In the quiet of night, emotions stir, memories bleed,
Unbidden, they come, in sleepless episodes' lead.
The heart, a tyrant, overrules the mind's plea,
Leaving me adrift in a sea of what could be.

Regret and remorse, relentless, they spin,
Until their weight ceases and I let them in.
For the umpteenth time, surrender takes its toll,
Sending this message out, from the depths of my soul.

This hour, so weak, I reach out in the dark,
Knowing dawn's light will ignite regret's spark.
Yet, I must speak now, while courage is near,
For silence is my greatest, most paralyzing fear.

Once, a nudge from you could have changed my fate,
I'd have moved mountains, before it was too late.
But that moment passed, our chances grew thin,
Goodness lost, in the silence of what might have been.

Emotions and memories, an endless cascade,
Like waves, they come, relentless, unswayed.
Yet here I am, yielding once more to the night,
A solitary figure, shooting arrows at the light.

 

Tuesday, March 12, 2013

वर्तमान




यूँ अचानक ही  घूमता है  वक़्त का पहिया
और होती हो तुम, और मैं,
इस समाज से परे
इस जहाँ से दूर।

तब समझाती है मुझे
वर्तमान के अहसास के तमाचे की झनझनाहट

कि धुंधला से गए हैं  यूँ गुजरते वक़्त के साथ
तुम्हारा चेहरा ,
साँसों की महक ,
और हंसी की खिलखिलाहट।।


Time Heals ?


धुन्दला से गए हैं  यूँ गुजरते वक़्त के साथ
तुम्हारा चेहरा , साँसों की महक और हंसी की खिलखिलाहट।

ऐसा सोच कर मैं
बेफ़िक्र जी रहा होता हूँ कि अचानक
किसी एक दिन
उठ जाता है एक सैलाब
और सावन की पहली बारिश के जैसी
अंधेड़ हवाओं के साथ शरीर के भीतर तक पहुँचती हुई
हर एक नस , हर रग  को कुरेद कर
हो जाती हैं आज़ाद वो यादें तुम्हारी।


फिर यादों के पंछी
किसी  तड़पते चमगादड़ के जैसे
मन मस्तिष्क की गहराहियों में घुसकर
यूँ सताते हैं, इस तरह रुलाते हैं
कि तड़प उठता है ये मन।

कुरेदने  लगती हैं इसको
वो यादें तुम्हारी
घूमता है  वक़्त का पहिया
और होती हो तुम, और मैं,
इस समाज से परे
इस जहाँ से दूर।

और तब
वर्तमान के अहसास के तमाचे की झनझनाहट
समझाती है मुझे

कि धुन्दला से गए हैं  यूँ गुजरते वक़्त के साथ
तुम्हारा चेहरा , साँसों की महक और हंसी की खिलखिलाहट।।






Monday, December 10, 2012

तेरा ख़्याल ?

कहीं दूर खड़ा है एक साया
तुम्हारा सा
आँखों में सवालों की किताब लिए
पलकों पे लिए सुबह की गुलाबी ओस की बूँदें ।

होंठ ऐसे कि जैसे हों एक उलझन में
जो मुस्कुराना तो चाहें मगर सिल जाएँ
गालों कि लाली जो बयां कर रही
वो उत्साह तुम्हारा, एक हिरनी के जैसा
और व्याकुलता ऐसी की थम जाए ये पल ।

जी चाहे बढ़ जाऊं मैं
उन भूली सी राहों पे
खोया था मैंने जहाँ एक उमंग के रंग को
वो नकाब जो बना है मेरा हिस्सा
उतार दूं उसको मगर
ये आइना बोले ये ख्याल भी झूठा है
तेरे भीतर है वो सक्ष, जिस से तू रूठा है ।।





Wednesday, November 21, 2012

टाइम पास

पहेली बुझा रहा हूँ एक आजकल
वो नजरें चुराना उसका
और फिर यूँ ही ज़रा सा झाँक के
आँखों के किनारे से
एक हलकी सी मुस्कान लबों पे ले आना ।।

और ये दिल मेरा
एक फुटबॉल की तरह
कभी इस तरफ तो कभी उस तरफ
बड़ा ही थकाने वाला है खेल ये ।।

एक मज़ा है बेशक
बेकरारी से भरा हुआ
ख्यालों  में जो डूबा रहता हूँ मैं
ये बेचैनी और बेखयाली का एहसास
यूँ खाली दिन गुजारने से तो कहीं अच्छा है ।।






Wednesday, September 5, 2012

सुन ले


वो अनजान,  बेखबर सा
दुनिया के दस्तूर ना समझे,
वो कुछ हैरान, अलग सा
तेरे तो फरमान ना समझे ।

तू सोचे इस सावन में
हवा ये मदहोश सी क्यूँ है,
वो सोचे इस मदहोशी में
यादों की सौगात सी क्यूँ है।

तू खेले ख़्वाबों में अटखेली
पर जीवन उसको लगे पहेली,
तेरे साथी सुनहरे सपने
कडवी यादें उसकी सहेली।







Sunday, December 25, 2011

किस्सा



प्यार में हारी हुई इस तकदीर का किस्सा
मैं ख़बरों में सुनाऊँ  के इश्तेहार में छापूँ
या रखे रखूं आँखों में उन सतरंगी यादों को
और सोते जागते बस मुस्कुरा के देखूं ?

दिमाग में कुछ ख़याल हैं,
कि तेरी बातें मैं कहूँ तो किसे कहूँ
कि तेरी यादें मैं बाटूँ तो किस से बाटूँ?
खाली दीवार पे भी दिखती है मुझे
तेरी आँखों की शरारत और लबों की मुस्कान
तुझे छू लेने के इस एहसास को मैं कैसे रोकूँ ?

आज कोई शिकायत नहीं है तकदीर से
है तो बस ढेर सारी यादें, और एक अजीब सा खालीपन
ये खालीपन का एहसास बदल दे
रख ले वापस तेरी यादों को, अब मुझे आज़ाद कर दे ||

Monday, October 3, 2011

फिर से जिंदगी

सुना क्या तुमने?    
मेरी ख्यालों में बसी हुई शिकायत की आहट को
देखा क्या तुमने ?
मेरी आँखों में बुझे अँधेरे को
छुआ क्या तुमने?
मेरी ख़ामोशी में समाये हुए शोर की ठंडक को 
पाया क्या तुमने?
उसको जो हमने कहीं खो दिया है
महसूस किया तुमने?
उस स्पर्श को जो कितना अपना सा है 
मिला क्या तुमको?
वो सन्देश जो अब भी कहीं मन की गहराइयों में दफ़न है |

लौट आई है क्या?
तुम्हारे होठों पे फिर से वही मुस्कान
तुम्हारी बातों में फिर से वही मासूमियत
तुम्हारी आँखों में फिर वही शरारत
तुम्हारे गालों की लाली |

क्या जी उठा है फिर वही डर?
फिर वही दर्द 
वही तड़प
और बेचैनी?

क्या जिंदगी से हो गयी है तुम्हारी सुलह?
फिर से ख़ामोशी से चहकना
कुछ न कहकर
सब कह जाना
क्या फिर से ?

हाँ मैंने सुना
जो तुमने नहीं कहा 
क्यूंकि
मैंने भी फिर से
सीख लिया है उड़ना 
वो धुन्दले ख्वाब बुनना
वो नगमे फिर से सुनना |

Saturday, April 23, 2011

पुनर्जन्म






चिलचिलाती धुप में प्यासा सा मैं
थक कर हाँफ रहा था कि
तेज हवा के साथ बारिश कि ठंडी बूँद 
गिरी जो माथे पर
चौंक गया, कुछ याद आया
पलकें जो भीगी, तो नजर आया

कि कंपकपाती सी
जो सामने खड़ी थी, मुस्कुराती सी
चमक लिए आँखों में 
खोले वो बाहें, उमंगों में लिपटी 
भीगी सी पलकें और वो साड़ी का
पल्लू कुछ अलग सा था
खुले से होठों पे शायद कुछ
शिकायत लिए तुम 
बढ़ रही थी 
कदम दर कदम 
नजदीक लग रही थी ||

और ये बारिश 
एक नुकीले तीर के  जैसी
मेरी आत्मा को भेद रही थी 
मन कि उलझन और सीने के डर ने
यूँ जकड़े थे कदम
और यूँ डगमगाता सा सोच रहा था मैं
कि अब और कितना नीचे गिरुं||

कि अचानक से तुमने जो आगोश में ले लिया
छूट गए सब बंधन
टूट गए सारे सपने
पिघल गया घनी बारिश में तन मेरा
एक लाल सागर में समां रहा है
और मेरी रूह कि खुशबू अब हवा में है||

हाँ, मैं मुक्त हो रहा हूँ
थम गयी है बारिश
तुम्हारा भी कोई निशाँ नहीं है
धुप कि वो चमक कहाँ है
पानी भी है पर प्यास नहीं है
और आँखों में भी 
एक नया खालीपन है
हवा के जैसा हल्का हो गया हूँ
शायद,
यही पुनर्जन्म है ||


Saturday, October 2, 2010

खादी का बस्ता

ये सोच के चलता हूँ कि चलते रहना है,
कठपुतलियों कि अठखेलियों में,
ठहाकों का मजा लेना है |

घिर कर खिलौनों से, बचपने में खो जाना है,
बस रात-दिन के फेर में,सोच-समझ से परे,
स्वचलित एक दिन हो जाना है |

ये कौन सा पड़ाव है
जो ना कभी गुरु जी ने पढाया था,
किस और चल पड़ा हूँ मैं
दादा जी ने कभी ये रास्ता तो ना दिखाया था |

क्या मैं उलझा हूँ इस मन कि उलझन में?
या फिर मेरी बेखयाली कि दुनिया का
ये भी एक बहिष्कृत ख़याल है?

या है ये वैसा ही सवाल,
जिसके जैसे बहुत सारे,
ठूंस कर भरे हैं
मेरे सिरहाने रखे,
 खादी के बसते में|

हर संध्या इन सवालों के, जवाब लिखा करता हूँ,
हर रात इन पहेलियों में उलझा,
ख़्वाबों में सुलझाया करता हूँ|

हर भोर सवालों का बस्ता, सिरहाने छोड़ जाता हूँ,
कूद जाता हूँ दुनिया के सागर में,
चंद नए सवाल समेट लाता हूँ|

और मेरे सिरहाने का बस्ता, बस यूँ भरता ही जाता है,
हर रात जो लगती है चौपाल,
एक नया सवाल गर्माता है|

घट जाता है निद्रा का पहरा,
अंतर्द्वंद बढ़ता ही जाता है||

Monday, August 2, 2010

पतझड़ की सड़क



पतझड़ की सड़क 

हम झूम के चलते थे और संग गुनगुनाते थे...
वो रेत, वो पत्ते, वो धूप और हवाएं |

वो पत्ते जब उगे थे
वो डरे थे सहमे थे,
वो बारिश में झूमे थे
वो हवाओं से लड़े थे,
वो धूप में खिले और
साथ में बढे थे |

वो पतझड़ की सड़क
जिसपे हम बढे थे,
जो पाऊँ से कुचले थे
जो रेत में दबे थे,
वो सिमटे से सिकुड़े से किनारे पड़े थे
वो टूट चुके थे, वो पत्ते झडे थे ||

Friday, November 6, 2009

क्यूँ !!?




एक दूर जाने का एहसास क्यूँ ,
नही हो पाई कभी पूरी ये बात क्यूँ ,

नासमझ ,ये दुनिया,
नादान , ये लोग,
मृग-पिपासु, ये मन,
संघर्षमय जीवन,
शायद मैं न समझा , शायद तुम न समझे ,
एक समझौते सी हो गई सारी बात क्यूँ !!

तुझसे दूर रहकर , तेरे साथ चला था ,
मेरे साए से लिपटा, तेरा एहसास चला था ,
आज, चलते हो तुम भी , चलता हूँ मैं भी ,
फिर चलती है हमारे बीच सारी कायनात क्यूँ !!

ख़ामोशी में हमने जो वक्त गुजारा ,
था दूर जब तूफ़ान, कितना करीब था किनारा ,
लग गई थी आँखें,पर जागे  रहे थे दो मन ,
फ़िर पैदा हो गए ये सब हालात क्यूँ !!

खामोश सा वो भय , जो सिर्फ ख्याल ना रहा,
न था कोई जवाब, अनसुलझा फिर क्यूँ ये  सवाल ना रहा,
जिसे कहना चाहा न कभी,
जिसे कह पाये न कभी ,
आख़िर सच हो गई फिर वही बात क्यूँ !!

एक दूर जाने का एहसास क्यूँ ,
नही हो पाई कभी पूरी ये बात क्यूँ !!

Monday, June 22, 2009

याद रखना ...



याद रखना
मेरी मुस्कुराहटों को
भूल के मेरी गलतियाँ
या शिकवे या शिकायतें।
क्या सोचता हूँ दिल में
शायद कभी बता न सका
एक भावनाओं का बाँध बनकर मैं
टूटने से ख़ुद को बचाता ही रहा ।
जो सहारा तुम से मिला है
उसको खोना ही सबसे बड़ा गिला है ॥


डरता हूँ की कहीं तुम्हे भूल न जाऊं
भरोसा नहीं की तुम याद रखोगे
पर जिंदगी की इस नई राह पर
अब अकेले तुझको चलना होगा
अकेले ही तुझे सीखना होगा
अपने आप ही तुझे संभालना होगा॥

मुस्कुरा के जीना तुने सिखाया
मेरे मन ने तुझे अपना बनाया
उस वक्त जो तूं साथ न होता
तो शायद ये मन अब उदास न होता।
तू हमेशा अपने आप पर हँसना
और यूँ ही सबके दिल में उतरना
तेरी आंखों का विश्वास हिम्मत देता है
तेरी बातों में जीने का तरीका मिलता है
अब ख्यालों में सदा तू मेरे साथ चलना ॥

अब मेरे साथ ऐ दोस्त
कभी रात को न जगना
कभी घाट न चलना
और न कभी मेरी बकवास सुनना
बस एक वादे क साथ अब अलविदा करना
कि जब भी याद करना मुस्कुरा के करना॥

Saturday, January 31, 2009

बाईक, मैं और लिम्ब्दी कार्नर

बाईक, मैं और लिम्ब्दी कार्नर
साथ में तुम सभी .

हाथ में चाय
चेहरे पे मुस्कान
और बदन में थकान


फटा हुआ लोअर
पांच दिन की शेव
अनजाने में दी हुई गाली
जेब की कंगाली


वो लड़कियों का झुंड
" आज कल भाव नहीं देता
इसीलिए समोसे खा रही है"
वो ऊंची आवाज़ में गाना
शुरू हो गई महफ़िल
छुपाई थी एक साइकिल


बोरे पर ही सो गया
याद में खो गया
ओए छोटू ! सात स्पेशल,
साला नहीं सुनेगा
अबे ! प्यार से बोल
देख कैसे घूर रहा है .


" एक पल में बीते तीन घंटे"


कभी सोचा है
कितनी श्यामें और हैं बाकी
कहाँ मिलेंगे फिर
आओगे न हर शाम
मिलोगे न हर शाम
कहाँ ?
कोई नहीं है जवाब
सिर्फ अँधेरा !!


नहीं! चिल्लाना नहीं
अभी बाकी है जिंदगी
जी लो इसको अभी
नहीं होंगे यहाँ फिर कभी
बाइक, मैं और लिम्ब्दी कार्नर
साथ में तुम सभी.

Saturday, November 22, 2008

प्रेम तुम्हारा




तुम्हारा प्रेम ही तो सच्चाई है
बाकी सब एक परछाई है
उस परछाई को देखा करता हूँ।

पर जब थक कर आँखे मूंदता हूँ,
तो बस तुम नज़र आती हो।