Sunday, December 25, 2011

किस्सा



प्यार में हारी हुई इस तकदीर का किस्सा
मैं ख़बरों में सुनाऊँ  के इश्तेहार में छापूँ
या रखे रखूं आँखों में उन सतरंगी यादों को
और सोते जागते बस मुस्कुरा के देखूं ?

दिमाग में कुछ ख़याल हैं,
कि तेरी बातें मैं कहूँ तो किसे कहूँ
कि तेरी यादें मैं बाटूँ तो किस से बाटूँ?
खाली दीवार पे भी दिखती है मुझे
तेरी आँखों की शरारत और लबों की मुस्कान
तुझे छू लेने के इस एहसास को मैं कैसे रोकूँ ?

आज कोई शिकायत नहीं है तकदीर से
है तो बस ढेर सारी यादें, और एक अजीब सा खालीपन
ये खालीपन का एहसास बदल दे
रख ले वापस तेरी यादों को, अब मुझे आज़ाद कर दे ||

Monday, October 3, 2011

फिर से जिंदगी

सुना क्या तुमने?    
मेरी ख्यालों में बसी हुई शिकायत की आहट को
देखा क्या तुमने ?
मेरी आँखों में बुझे अँधेरे को
छुआ क्या तुमने?
मेरी ख़ामोशी में समाये हुए शोर की ठंडक को 
पाया क्या तुमने?
उसको जो हमने कहीं खो दिया है
महसूस किया तुमने?
उस स्पर्श को जो कितना अपना सा है 
मिला क्या तुमको?
वो सन्देश जो अब भी कहीं मन की गहराइयों में दफ़न है |

लौट आई है क्या?
तुम्हारे होठों पे फिर से वही मुस्कान
तुम्हारी बातों में फिर से वही मासूमियत
तुम्हारी आँखों में फिर वही शरारत
तुम्हारे गालों की लाली |

क्या जी उठा है फिर वही डर?
फिर वही दर्द 
वही तड़प
और बेचैनी?

क्या जिंदगी से हो गयी है तुम्हारी सुलह?
फिर से ख़ामोशी से चहकना
कुछ न कहकर
सब कह जाना
क्या फिर से ?

हाँ मैंने सुना
जो तुमने नहीं कहा 
क्यूंकि
मैंने भी फिर से
सीख लिया है उड़ना 
वो धुन्दले ख्वाब बुनना
वो नगमे फिर से सुनना |

Saturday, April 23, 2011

पुनर्जन्म






चिलचिलाती धुप में प्यासा सा मैं
थक कर हाँफ रहा था कि
तेज हवा के साथ बारिश कि ठंडी बूँद 
गिरी जो माथे पर
चौंक गया, कुछ याद आया
पलकें जो भीगी, तो नजर आया

कि कंपकपाती सी
जो सामने खड़ी थी, मुस्कुराती सी
चमक लिए आँखों में 
खोले वो बाहें, उमंगों में लिपटी 
भीगी सी पलकें और वो साड़ी का
पल्लू कुछ अलग सा था
खुले से होठों पे शायद कुछ
शिकायत लिए तुम 
बढ़ रही थी 
कदम दर कदम 
नजदीक लग रही थी ||

और ये बारिश 
एक नुकीले तीर के  जैसी
मेरी आत्मा को भेद रही थी 
मन कि उलझन और सीने के डर ने
यूँ जकड़े थे कदम
और यूँ डगमगाता सा सोच रहा था मैं
कि अब और कितना नीचे गिरुं||

कि अचानक से तुमने जो आगोश में ले लिया
छूट गए सब बंधन
टूट गए सारे सपने
पिघल गया घनी बारिश में तन मेरा
एक लाल सागर में समां रहा है
और मेरी रूह कि खुशबू अब हवा में है||

हाँ, मैं मुक्त हो रहा हूँ
थम गयी है बारिश
तुम्हारा भी कोई निशाँ नहीं है
धुप कि वो चमक कहाँ है
पानी भी है पर प्यास नहीं है
और आँखों में भी 
एक नया खालीपन है
हवा के जैसा हल्का हो गया हूँ
शायद,
यही पुनर्जन्म है ||